Monday, February 9, 2009

Bachpan

था वो दौर-ए-हंसी ,
लगती थी भरी धूप भी चाँदनी ,
वो चहकना चिड़ियों सा,
वो मुस्कुराना तारों सा,
कहाँ गये वो दिन, वो रातें !
कल की वो हकीकत ,
आज का स्वप्न हो गयी!
बंद पलकों से , फिसल कर कहाँ फ़ना हो गयी ?

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